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thought
परमात्मा को प्रयास से पाने का कोई भी उपाय नहीँ है. उसे तो सिर्फ़ अप्रयास से ही पाया जा सकता है जहाँ तुम अपनी हर मान लेते हो वहीं से परमात्मा कि विजय शुरू होती है.
तुम परमात्मा को भी अपने बैंक बैलेंस मे कहीं जोड़ लेना चाहते हो. इस दावेदारी का होना ही तुम्हारे लिए बाधा है. जितना तुम जीतते जाते हो उतना ही तुम्हारा अहंकार चॅडता जाता है
जो न तो स्वयं को कष्ट देता है और न ही दूसरे को , वह ही सच्चा साधु है
तुम जितने ही अधिक सिकुड़ते जाओगे, अहंकार उतना ही अधिक हो जाएगा . तुम जितने अधिक फैल जाओगे तुम्हारा अहंकार उतना ही कम हो जाएगा . अहंकार एक तरह का संकुचन है और ब्रह्म अनुभव एक तरह का विस्तार.
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