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aadmi
दिन व दिन मर रहा है आदमी फिर भी क्या -क्या कर रहा है आदमी गिर जाते है बनकर पक्के महल फिर भी सपनो के महल मे पल रहा है आदमी नहीँ हिम्मत की तोड़ दे दुनिए के रस्मो-रिवाज़ बन्धनो मे दुनिया के सॅड रहा है आदमी मरता है रोज आदमी -आदमी के सामने फिर दुस्मन क्यों आदमी का बन रहा है आदमी बनाया श्रेष्ठ जहांन मे आदमी को भगबान ने जानवरो सा व्यवहार क्यों कर रहा है आदमी जीत सका नहीँ कोई दुख से अब तक यहाँ सुख की चाह मे ही लड़ रहा है आदमी दिन व दिन मर रहा है आदमी फिर भी क्या -क्या कर रहा है आदमी अनिल वर्मा 29/7/93
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